उत्तर : रमाबाई को संस्कृत में उनके असाधारण ज्ञान और पांडित्य के कारण वर्ष 1878 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा 'पंडिता' और 'सरस्वती' की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
प्रश्न - ख) स्त्रियों को किस रूप में प्रशिक्षण देने के विषय में रमाबाई ने जोर दिया?
उत्तर : रमाबाई ने स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छपाई (printing), टंकण (typing) और काष्ठकला (woodcraft/carpentry) जैसे व्यावसायिक और तकनीकी कौशल (आजीविका से जुड़े प्रशिक्षण) देने पर विशेष जोर दिया था।
प्रश्न - ग) अमेरिका से आई सहायता के पश्चात शारदा सदन कहाँ बनाया गया?
उत्तर : अमेरिका से प्राप्त आर्थिक सहायता और सहयोग के बाद शारदा सदन की स्थापना सबसे पहले मुंबई (बॉम्बे) में 11 मार्च 1889 को की गई थी, जो बाद में पुणे नगर में स्थानांतरित कर दिया गया था।
सही गलत
प्रश्न - 2. सही कथन के आगे सही (✓) का चिह्न और गलत कथन के आगे गलत (✗) का चिह्न लगाइए -
दिए गए कथनों के सही (✓) और गलत (✗) चिह्न इस प्रकार हैं:
उत्तर : रमाबाई महिलाओं के अधिकारों की मूक प्रतिनिधि थीं। – (✗ गलत) (वह मूक नहीं बल्कि मुखर और प्रखर प्रणेता थीं)उत्तर : क) रमाबाई महिलाओं के अधिकारों की मूक प्रतिनिधि थीं। – (✗ गलत) (वह मूक नहीं बल्कि मुखर और प्रखर प्रणेता थीं)उत्तर : ख) रमाबाई में सामाजिक अन्याय का सामना करने का अटूट साहस था। – (✓ सही)उत्तर : ग) रमाबाई अर्थी उठाने वाली प्रथम हिंदु महिला हुईं। – (✗ गलत) (उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था और वह हिंदू नहीं थीं)उत्तर : घ) रमाबाई ईसाई धर्म से बहुत प्रभावित थीं। – (✓ सही)उत्तर : ङ) रूढ़िवादी ब्राह्मण समाज के आरोपों के आगे रमाबाई ने घुटने टेक दिए। – (✗ गलत) (उन्होंने रूढ़िवादिता और सामाजिक अन्याय का डटकर मुकाबला किया था, घुटने नहीं टेके)
लिखित प्रश्नोत्तर 3. संक्षिप्त प्रश्नोत्तर -
प्रश्न - क) 1889 में मुंबई में आयोजित अधिवेशन में प्रतिनिधियों के पास किसके प्रश्नों का कोई उत्तर न था? क्यों?
उत्तर : 1889 के मुंबई अधिवेशन में स्त्रियों से जुड़े प्रश्नों का प्रतिनिधियों के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था, क्योंकि उस समय समाज में स्त्रियों की शिक्षा और स्वतंत्रता को लेकर अनेक रूढ़ियाँ और सामाजिक बंधन थे।
प्रश्न - ख) पंडित अनंत शास्त्री डोंगरे कौन थे? उनके चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर : पंडित अनंत शास्त्री डोंगरे रमाबाई के पिता थे। वे संस्कृत के विद्वान और प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे।
उनकी दो विशेषताएँ थीं—
1-वे स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे।
2-वे निडर और रूढ़िवादिता का विरोध करने वाले व्यक्ति थे।
प्रश्न - ग) कोलकाता की रमाबाई के जीवन में क्या महत्वपूर्ण भूमिका रही है?
उत्तर : कोलकाता में रमाबाई के संस्कृत ज्ञान और विद्वता को पहचान मिली। वहाँ विद्वानों ने उनके ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें ‘पंडिता’ और ‘सरस्वती’ की उपाधियाँ प्रदान कीं। इससे उनके जीवन में एक नई पहचान बनी और उन्हें स्त्रियों की शिक्षा के लिए कार्य करने की प्रेरणा मिली।
4. विस्तृत प्रश्नोत्तर
प्रश्न - क) ‘नारी शिक्षा’ व ‘नारी प्रशिक्षण’ के क्षेत्र में रमाबाई का क्या योगदान रहा?
उत्तर : रमाबाई ने भारत में नारी शिक्षा और नारी प्रशिक्षण के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने स्त्रियों को शिक्षित करने के साथ-साथ उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने महिलाओं के लिए विद्यालय और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए। वे चाहती थीं कि स्त्रियाँ शिक्षिका, डॉक्टर आदि के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त करके अपने पैरों पर खड़ी हों। उन्होंने शारदा सदन की स्थापना करके महिलाओं को शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण देने का कार्य किया। इस प्रकार उन्होंने महिलाओं को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सम्मान का मार्ग दिखाया।
प्रश्न - ख) ‘रमाबाई एक प्रगतिशील महिला थीं’—इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर : रमाबाई वास्तव में एक प्रगतिशील महिला थीं। उस समय जब समाज में महिलाओं की शिक्षा को उचित नहीं माना जाता था, उन्होंने स्वयं शिक्षा प्राप्त की और दूसरी महिलाओं को भी शिक्षित करने का प्रयास किया। उन्होंने रूढ़िवादी विचारों और सामाजिक बंधनों का विरोध किया। वे महिलाओं को आत्मनिर्भर और सम्मानपूर्ण जीवन जीते हुए देखना चाहती थीं। उन्होंने विधवाओं और जरूरतमंद महिलाओं के लिए भी कार्य किया। उनके विचार अपने समय से बहुत आगे थे। इसलिए उन्हें एक साहसी, जागरूक और प्रगतिशील महिला कहा जाता है।
प्रश्न - ग) पिता की परवरिश का रमाबाई पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : रमाबाई के पिता पंडित अनंत शास्त्री डोंगरे संस्कृत के विद्वान और प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे। उन्होंने रमाबाई को उस समय शिक्षा दी, जब लड़कियों की शिक्षा को समाज में अच्छा नहीं माना जाता था। पिता ने उन्हें संस्कृत का गहरा ज्ञान दिया और स्वतंत्र रूप से सोचने की प्रेरणा दी। उनकी परवरिश के कारण रमाबाई में आत्मविश्वास, साहस, ज्ञान के प्रति प्रेम और रूढ़ियों का विरोध करने की भावना विकसित हुई। आगे चलकर इन्हीं गुणों ने उन्हें महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी।